April 03, 2025
स्वागतं नव संवत्सरम्’— सांस्कृतिक-साहित्यिक अभिव्यक्ति के साथ नववर्ष का स्वागत
*’स्वागतं नव संवत्सरम्’— सांस्कृतिक-साहित्यिक अभिव्यक्ति के साथ नववर्ष का स्वागत*
जींद : अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, जींद इकाई द्वारा विक्रम संवत 2082 के शुभारंभ पर “स्वागतं नव संवत्सरम्” शीर्षक से सांस्कृतिक-साहित्यिक पर्व का आयोजन दिनांक 1 अप्रैल 2025 को विवेकानंद भवन, चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जींद में किया गया।*
यह आयोजन नव ऊर्जा, नव संकल्प और नव चेतना के भाव के साथ भारतीय सांस्कृतिक चेतना को दृढ़ता से स्वीकारने और भावी पीढ़ी को सौंपने वाला एक गौरवशाली आयोजन था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार, विचारक एवं शिक्षाविद डॉ. मंजुलता ने की। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा:
*नव संवत्सर केवल पंचांग का एक नया पृष्ठ नहीं होता, यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा का नवजागरण है। हिंदू नववर्ष पश्चिमी नववर्ष की भौतिक चकाचौंध से भिन्न, आध्यात्मिक आरंभ का प्रतीक है। यह दिन ब्रह्मा जी के सृष्टि निर्माण का है, जो हमारे भीतर सृजन, चेतना और राष्ट्रधर्म के पुनरुत्थान का आह्वान करता है। हमें साहित्य और संस्कृति के माध्यम से राष्ट्र की आत्मा को स्वर देना है। यही नवसंवत्सर की सार्थकता है।*
डॉ. मंजुलता ने “नव संवत्सर की वेला” शीर्षक से एक कविता अत्यंत हार्दिकता से प्रस्तुत की
*संस्कृति की पालकी आई, लिए पुरातन-नीति*
*ऋतुचक्र ने बदली चूनर, फूलों की मुस्कान,*
*हिंदू नववर्ष फिर आया, लेकर पुण्य प्रमाण।*
विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित श्रीमती हिमानी गुप्ता, जो एक सक्रिय संस्कृति-कर्मी हैं, ने अपने भावपूर्ण वक्तव्य में कहा:
*नवसंवत्सर हमारी संस्कृति से जुड़ने और परंपराओं को समझने का एक सुंदर अवसर है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को यह बताते हैं कि हमारा हिंदु नववर्ष हमारी परंपराओं और जीवन की लय के अनुरूप है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् का यह प्रयास प्रशंसनीय है — यह समाज में संस्कृति और संस्कारों की चेतना को जाग्रत करने वाला कार्य है।*
जिला इकाई की अध्यक्ष श्रीमती मंजू मानव ने अतिथियों और सहभागियों का स्नेहिल स्वागत करते हुए नववर्ष को महान पर्व बताया। और अपने मधुर कंठ से यह गीत गाती हुई सब को भारतीय ताकि रंग में रंग दिया
*नववर्ष का यह पर्व हमें, अपनेपन से जोड़ता है,*
*मिट्टी की खुशबू में भी, संस्कारों को तोलता है।”*
मंजू मानव ने कहा कि हिन्दू नववर्ष की हमारी नई पीढ़ी को हमारी जड़ों सेजोडता है, जो बढ़ती हुई उनके भावी जीवन को उज्जवल बनाता है ,भटकी हुई हमारी संतति को राह दिखाने का दीपस्तंभ हैं।
इस आयोजन में प्रांतीय संचार मंत्री डॉ. शिवनीत की उपस्थिति ने कार्यक्रम को संगठित संरचना और समन्वय की दृष्टि से एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
उन्होंने कहा:
*हिन्दू नववर्ष भारतीयता का गौरव है। साहित्य और सजीव संस्कृति की आत्मा हैं। हमें पूरे उल्लास और उत्साह के साथ अपनी इस पर्व को मनाना चाहिए और प्रतिपदा से लेकर राम नवमी तक हर रोज़ अपने घरों में दीप प्रज्वलित करने चाहिए।*
उन्होंने “स्वागतं नव संवत्सरम्” जैसे आयोजन को “सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम” बताते हुए यह भी कहा
*प्रौद्योगिकी के इस युग में संचार और संवेदना को साथ लेकर चलना ही किसी भी संगठन की स्थायित्वपूर्ण सफलता की कुंजी है। हम प्रयासरत हैं कि अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की चेतना एक जीवंत धरोहर बनकर जनमानस तक पहुँचे।*
*नववर्ष वहीं होता है जहाँ प्रकृति स्वयं नूतनता का स्पर्श देती है। कोपलों में जीवन फूटता है, हवाओं में नयापन होता है। हमें खेद है कि हमने पश्चिम की परंपराओं का अंधानुकरण करते हुए अंग्रेज़ी नववर्ष को अपनाया, जबकि वह हमारी आत्मा का उत्सव कभी था ही नहीं। अब समय है कि हम अपने नववर्ष, अपनी परंपराओं और अपनी पहचान को पुनः जीवंत करें।*
कार्यक्रम में डॉ. संदीप कुमार पानू ,डॉ. आनंद कुमार,इकाई संगठन मंत्री डॉ. क्यूटी, कोषाध्यक्ष सुमन पूनिया, प्रो. सुनील कुमार,
सहित अनेक प्रबुद्धजनों ने अपने विचार प्रस्तुत किए । उल्लेखनीय सहभागिता नवोदित रचनाकारों की थी जिनमें नीरज, सुधा, मीनाक्षी, संदीप, पंकज और मीरा ने अपनी साहित्यिक प्रस्तुतियों और सांस्कृतिक सहभागिता से कार्यक्रम को ऊर्जस्वित किया।उन्होंने न केवल सक्रिय सहभागिता निभाई, बल्कि नववर्ष की चेतना को युवा स्वर भी प्रदान किया
डॉ संदीप ने कहा कि
*नव संवत्सर जैसे पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं और यह स्मरण कराते हैं कि भारतीयता केवल इतिहास नहीं, जीवंत परंपरा है।*
*डॉ आनन्द ने जोर देकर कहा कि*
*नवसंवत्सर केवल एक वर्ष परिवर्तन नहीं, बल्कि यह भारतीय जीवन दृष्टि में ‘नव आरंभ’ का बोध कराता है। एक ऐसा आरंभ, जहाँ प्रत्येकनागरिक अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को स्मरण कर राष्ट्र निर्माण में भागीदार बन सकता है*
डा क्यूटी ने मधुर सुरीले कंठ से जब गाया
*चिंता क्यों करें ,चिंतन करे ,चिंतन पवित्र पावन है* तो सभी भाव विभोर हो उठे और गीत के अंत में सब ने समवेत स्वर से यही गान किया।
डॉक्टर सुमन पूनिया ने बड़ी खुले मन से कहा कि *ऐसे आयोजन हमें दिशा दिखाते है, सन्मार्गी बनाते हैं और समाज में कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करते हैं।*
मंच संचालन अत्यंत सशक्त एवं भावप्रवण शैली में डॉ. पूनम बिडलान ने किया। संचालन के साथ-साथ उन्होंने मंच पर अपनी एक प्रभावशाली कविता की पंक्तियाँ भी प्रस्तुत कीं, जो श्रोताओं के हृदय को छू गई:
मेरे दिल में बैठकर वो, मेरी नसों में ज़हर घोले जा रहे थे…
किनारे पर बैठकर वो, समुद्र की गहराई नाप रहे थे…
कोसों दूर होकर वो, मेरे दिल में उतरने की तरकीब ढूँढ रहे थे…”